डॉ. बावसकर तकनीक (विज्ञान) से अनउपजाऊ आधा एकड में १३ - १४ क्विंटल कपास


श्री. रोमीयो शिवबगस व्यास,
मु. कोंडल, पो. मारवाड
बिछडी, ता. फलोदी, जि. जीधपूर. (राजस्थान)
मोबा. ०९६६०१७९७२०

हमने कपास की बुवाई ८।। बिघेमे जून २०११ को कियी थी । असी वक्त में ससुराल पुना मे आया था, तो वहाँ पे डॉ. बवासकर तकनीक के कृषी विज्ञान और कपास की किताब मिली । असमे दियी हुई जानकारी घर जाकर पढी तो मैने उसका प्रयोग कपास पर करने के बारे में सोचा । इसलिए ससुरजी को बताकर पुनासे सप्तामृत १-१ लि मंगवाये और उसका घर के पास आधा एकर (सव्वा बिघा) मे पहाडी एरिया (उंचाई पर) वालू मिश्रीत खेतीमें राशी १३४ - २ की बुवाई २' x १।।' पर कियी थी, उसपर इस्तेमाल किया । तब वो कपास १ से १।। फूट उंचाई की थी । तभी सप्तामृत का पहिला स्प्रे किया । उससे पौधे की उंचाई २ से ३ फुट तक हुई । फुल बहुत लगे । उसके बाद दूसरा स्प्रे किया उसके पहले थंडी के कारन पत्ते गिरे थे । उसे नहे पत्ते निकले । बहुतसे टिंडे निकले । कपास की उंचाई लगभग १०' से १२' तक हुई थी और १२०० से १५०० टिंडे (कपास के बोंड/कैरी) लगे थे । उंचाई जादा होने की वजह से चुगाई मजदुरो के भरोसे पे नहीं की, क्योंकी कपास की उंचाई जादा होने के कारन चुगाई के वक्त पौधे का नुकसान हो जाता डाली टूट जाती । उसमे छोटे बड़े टिंडे, फुल का नुकसान हो जाता । और ६ हजार मजदुरीभी देने पड़ती । तो पहली चुगाई में सव्वा बिधे (आधा एकड) मे ६-७ क्विंटल कपास मिला । दूसरी बार चुगाई की तो ५ क्विंटल उत्पाद मिला । पीछे जी माल बचा है वो लगभग २ - ३ क्विंटल मिलेगा । इसी तरह अर्धा एकर में डॉ.बावसकर तकनीक की वजहसे १३ - १४ क्विंटल उत्पाद हुआ । असमे से १२ क्विंटल मंडी मे बेचा, तो ५००० रू./ क्विंटल भाव मिला। शहर मार्केट से यहाँ अच्छा पैसा मिलाता है । अभी ४६०० ते ४७०० क्विंटल भाव चला है । अब ५३०० - ५४०० रू./ क्विंटल तक भाव बढेगा । हमारे यहा एक बिधें मे ८-९ क्विंटल उत्पाद बाकी किसानोंको मिला है । हमे एक बिघे में डॉ. बावसकर तकनीक से १३ -१४ क्विंटल उत्पाद मिला है ।

हमने बडी खेती मे जो ८।। बिघा कपास किया था । उसमें से आधा बीघा जादा पानी की वजह से खल्लास हो गया । बाकी का बचा हुवा ८ बिघे मे से चुगाई करते वक्त ८० क्विंटल उत्पाद इस हिसाब से मिलेगा ऐसा लगा । लेकिन पुरी चुगाई हो गई तो सिर्फ ३७ - ३८ क्विंटल कपास मिला । याने की डॉ. बावसकर तकनीक से हमको दुगना कपास का उत्पाद मिला ।

इसलिए आगे जिरा, गेहू, बाजारी, गवार, मटकी को भी यही तकनीक का इस्तेमाल करेंगे ।

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